कहानी: बेहरी दादी

             माथे पर चंदन का टीका, गले में तुलसी की माला, कानों में चमकते रत्न जड़ित कर्णाभूषण जो नीले आकाश में चमकते सूरज की भाँति हैं, शरीर की चमड़ी ढीली होने की प्रारंभिक अवस्था, चमचमाती साफ – सुथरी सफेद साड़ी और समीप आए तो गुलाब के फूलों की महक जो बगिया में खिले फूलों की आभा देती, नाक तो एकदम कमल के डंठल- सी पतली ऊँची उठी हुई नाक, सेब समान गोल – मटोल लाल – लाल गाल,  मुस्कुराते समय सफ़ेद मोतियों से चमकते दाँत और तो और लालिमा युक्त होंठ मिट्ठू की चोंच याद दिलाती l ये हैं हमारे चंदनपुर गाँव की बेहरी दादी l इन्हें देखती हूँ तो पुरानी फिल्मों की नायिकाएँ याद आती हैं, पर एक बात से मन कौंधता था कि उन्हें इस प्रदेश के लोग बेहरी दादी क्यों बुलाते हैं l मुझे लगा कि शायद उन्हें कम सुनाई देता होगा पर मैं मानने को तैयार नहीं थी क्योंकि जब भी मैं उनके घर के आँगन से गुज़रती हूँ तो हर बार इनका सबसे पहला प्रश्न होता है,  “कैसी हो?” मैं उत्तर देती थी, “बढ़िया” और बेहरी दादी वही शब्द दोहराती थी- ” बढ़िया” यानी दादी को पूर्ण रूप से सुनाई देता है फिर भी इनका नाम बेहरी दादी क्यों रखा, जानने की बड़ी जिज्ञासा थी l

            इस तरह हर दिन मुझसे यही सवाल करती थी, और मैं उनके इस  सवाल से ऊब नहीं जाती थी बल्कि उनसे और अधिक बातें करने के लिए उत्साहित थी l मेरे घर से बस स्टॉप का रास्ता थोड़ा लंबा था,  बेहरी दादी के घर के पिछवाड़े से होते हुए उनके घर के सामने का रास्ता सीधे बस स्टॉप की ओर जाता है l समय बचाने हेतु मैं दादी के घर के आँगन से होते हुए जाना चाहती थी l दादी मेरे मन की बात समझ गई और कहा-” तुम बस स्टॉप इसी रास्ते से जाया करो, तुम्हारा समय बच जाएगा l”

             उस दिन से मैं उनके घर के  आँगन के रास्ते से बस स्टॉप जाने लगी l तब हर दिन बेहरी दादी आँगन में पड़े सूखे पत्तों को सूखी नुकीली टहनी  से निकालती हुई दिखाई देती थी l मुझे देखते ही बेहरी दादी खुश होकर वही प्रश्न पूछती l एक बार बेहरी दादी ने देखा कि मैंने दो-दो बैग एक ही कंधे पर लटकाया है, तुरंत दोनों बैगों को नीचे रखवाया और कहा, तुम्हें दोनों कंधों पर एक- एक बैग रखकर चलना चाहिए,  एक तरफ सारे बैग का बोझ मत रख, कमर दुखेगी l” मैं हर दिन घर से निकलते वक़्त दोनों कंधों पर एक- एक बैग लेकर चलती थी,  मैं ठीक उनके घर के सामने पहुँचते ही दोनों बैगों को एक कंधे पर लटकाती थी l दादी मेरे दोनों कंधों पर एक- एक बैग लटकाने तक वहाँ से हिलने नहीं देती थीं और इस तरह का मेरा बर्ताव जान बूझकर था क्योंकि मैं  उनसे रोज़ बात करना चाहती थी l

             एक दिन उनके घर के पिछवाड़े से आँगन की तरफ आई तो देखा कि आँगन का फाटक बंद है l दिल पर ज़ोर से झटका लगा कि यह क्या, हमेशा खुला रहने वाला फाटक आज बंद कैसे हो गया? बेहरी दादी की आवाज़ भी सुनाई नहीं दे रही हैं, कहीं दादी की तबीयत खराब तो नहीं है,  दिल की धड़कन ने हिम्मत बाँधी और पीछे घर की ओर मुड़कर देखा तो दरवाज़े पर बड़ा- सा ताला था,  उसके ऊपर तख्ते पर लिखा था-”हाउस फॉर सेल “l दिल  पर बिजली गिरने जैसा अनुभव हुआ I अपने आप को संभालकर इधर-उधर झाँककर देखा,  पड़ोसन छत पर खड़े होकर बाल बना रही थीं, उन्होंने कहा,” अब यह रास्ता कभी नहीं खुलेगा, आम जनता के लिए यह रास्ता बंद है l” मुख पर प्रश्न चिह्न लिए लंबे रास्ते से होते हुए बस स्टॉप पहुँची I मेरी तरह  रोजाना बेहरी दादी के घर के रास्ते से चलने वाले चार लोगों को बात करते हुए सुना कि बेहरी दादी का बेटा बहरीन से आया है, वह घर बेचना चाहता हैl   दरअसल उन्हें कैंसर  हुआ है , बेटे को पता चला कि वे कुछ ही दिन जीवित रहेंगी l उनके मरण के समय घर में वे अकेली न पड़ जाए इसलिए बेटा बेहरीन ले जाने आया है I बेटे के साथ बेहरीन न जाकर वे  वृद्धाश्रम चली गई l तब मुझे पता चला कि बेहरी दादी का परिवार सालों पहले बहरीन में रहते थे l दादी के पति का निधन हो जाने पर उनका पढ़ा- लिखा जवान बेटा पिताजी के कारोबार को  संभालने लगा और उसने वहीं शादी कर ली l कुछ दिन बाद बेहरी दादी  बहरीन छोड़कर अपने चंदनपुर गाँव में वापस आ गईl बहरीन से आई दादी को लोगों ने बेहरी दादी बुलाना शुरू किया l नसीहत देने वाली बेहरी दादी को हम देख नहीं पाएँगे,  सुन नहीं पाएँगे, चारों तरफ यही सुनाई दे रही थी I 

              उस दिन से  मैं उनके घर का रास्ता छोड़कर लंबे रास्ते से निकलती और उनकी बातों को याद करती थी l तभी मशीन पर दबे बटन से काम करने वाले रोबोट की तरह मैं अपने भारी भरकम बैग को दोनों कंधों पर उठाकर चलती हूँ और इसी आशा से कि बेहरी दादी  हमसे मिलने कभी न कभी ज़रूर आएँगी l 

Penned by Jayaajitan.

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