कविता :विवश  मन            

मन नहीं माना, मन को

नहीं जाना l

माना तो किसने माना, यह

नहीं जाना।

मन ही मन की मनमानी,

नहीं जाना ।

मन तो सपनों का पुतला है,

नहीं जाना ।।

 मनमौजी मेरा है वेश,

नहीं जाना ।

 चंचलता बेरहमी ही लाती

 नहीं जाना।।

 दिन गुजरे लक्ष्यहीन में,

नहीं जाना।

गुजरे दिन नहीं आयेंगे,

नहीं जाना।।

Penned by Jayaajitan.

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