शिक्षक दिवस मना लिया गया और इस दिन छात्रों का भी स्नेह जान लिया गया । प्रायः पूरे वर्ष छात्रों को पढ़ाने के बाद हम अध्यापकों के प्रति सम्मानस्वरूप शिक्षक दिवस मनाते हैं । इस दिन अध्यापकों को छात्रों द्वारा सुंदर व मनमोहक शब्दों में लिखे गए कार्ड प्रदान करने की रीति बढ़ती जा रही है । इसे प्राप्त करने वाले हम अध्यापक संतोष का अनुभव करते हैं । इस तरह की खुशी के दौरान गौरवान्वित होना स्वाभाविक है । इस संदर्भ में समाज में गर्व से सिर ऊँचा करके चलते समय नाम के सामने उपसर्ग ‘टीआर’ लगाने की घोषणा कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के शिवकुमार जी ने कर दी है । अब हम शिक्षक अपने नाम के आगे ‘टीआर’ लगाएंगे । रही बात नेम प्लेट की तो इसे घर के द्वार पर या निजी गाड़ी पर लगाया जा सकता है, इसकी वास्ताविक उपयोगिता और महत्त्व क्या होगा यह शायद हम समय के साथ जान लेंगे ।
खुशी से झूमते मन को गहरा आघात पहुँचाने वाली एक और घटना सामने आई है । हमारे विद्यालय में पिछले पैंतीस वर्षों से अध्यापिका के पद को सुशोभित करने वाली और ‘गुरुओं की गुरु’ कहलाने वाली शिक्षिका ने अचानक त्यागपत्र दे दिया । हुआ यह था कि एक छात्र को डाँटे जाने पर उसके अभिभावकों ने शिकायत की कि उनकी संतान का सबके सामने अपमान किया गया है। इस झूठी शिकायत नेअध्यापिका के पैंतीस साल के अनुशासित, व्यवस्थित और स्नेहमयी यात्रा पर एक विरोधाभासी प्रश्न खड़ा कर दिया है। इसे अपना अपमान मानकर उन्होंने सेवानिवृत्ति से केवल एक साल पहले ही स्कूल छोड़ने का निश्चय किया । भविष्य में प्राप्त होने वाले वित्तीय लाभों की उपेक्षा करते हुए उनके स्वाभिमान के इस कदम ने हमारे उत्साह को भी बाधित किया है। ऐसी घटना किसी एक अध्यापक के साथ नहीं बल्कि कई अध्यापकों के साथ हो रही है l इसलिए हर वर्ष कम से कम दस शिक्षकों द्वारा स्कूल छोड़ने की घटना देखने को मिलती है । इन दस शिक्षकों के रिक्त स्थान पर मुश्किल से छह या सात की भर्ती होती है और आखिरकार बचे हुए तीन लोगों के काम को अन्य शिक्षकों में बाँटने का चलन चल पड़ता है I ऐसे में शिक्षकों पर काम का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है ।
आमतौर पर लोगों का मानना है कि शिक्षकों की नौकरी और सेवा आरामदायक है क्योंकि उन्हें छुट्टियों पर छुट्टियाँ मिलती हैं । लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता है कि शिक्षकों को छुट्टियों में भी स्कूल का काम करना पड़ता है। इन दस दिनों में परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच करने के उपरांत नाम सूची में अंकों को हस्त लेखन में तथा कंप्यूटर में अंकित करने का काम भारी तनाव के बीच करना पड़ता है। कहा जाए तो कॉर्पोरेट जॉब जैसा तनाव शिक्षकों को भी झेलना पड़ता है । मेरी एक सहेली जो कॉर्पोरेट में नौकरी करती थी, उसने मेरे स्कूली काम को अनदेखा करके केवल छुट्टियों पर नज़र डाली,अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी और मेरे ही विद्यालय में नौकरी पा ली । उस दिन से हम दोनों का स्कूल आना-जाना एक साथ होने लगा । परंतु कुछ दिनों के बाद वह स्कूल के बाद रुककर अपना अधूरा काम पूरा करने लगी I जब मैंने उसके स्कूल के बाद रुकने का कारण पता किया तो समझ आया कि वह कक्षा कार्य की पुस्तिकाओं को जाँचने के लिए स्कूल में रुकती है l मैंने इस समस्या के समाधान के लिए उसे समझाया कि इन सब किताबों को घर ले जाकर जाँचे ताकि स्कूल और घर के काम को संतुलित करते हुए अपना समय बचा सके । कॉरपोरेट ऑफिस में ओवरटाइम करने की आदी मेरी सहेली ने मेरी बात को नकारा था । लेकिन अचानक चौथे महीने में उसने मुझे यह कहकर चौंका दिया कि उसे टीचर की जॉब जंच नहीं रही है इसलिए वह नौकरी छोड़ रही है। बाद में दूसरे अध्यापकों से मुझे पता चला कि वह अपनी क्लास के बच्चों को पढ़ाई के तनाव से मुक्त कराने के लिए उन्हें नाचने, गाने, खेलने और ज़ोर-ज़ोर से हँसने- चिल्लाने के लिए कहती थी। इससे धीरे-धीरे बच्चे केवल मस्ती करने के लिए उत्साहित रहने लगे । ऐसे में उसे छात्रों को नियंत्रित करने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा । इस तरह कक्षा में शोर-शराबे की वजह से प्रधानाचार्य और मैनेजमेंट को कई शिकायतें मिलने लगी थीं ।
मुझे इस घटना से यही लगा कि शिक्षक की भूमिका निभाने में यह उत्कर्ष के पर्यवसान का ही नतीजा है। जबकि शिक्षा की माँग में विद्यालय के सभी क्रियाकलापों में शिक्षकों को सर्वदा उत्साहित रहना चाहिए l उन्हें विद्यालय के हर कार्यक्रम जैसे- नृत्य, गान आदि का ज्ञान होना उनके लिए अतिरिक्त योग्यता है । ऐसे में शिक्षण एक ऐसा व्यवसाय बन गया है जहाँ टीचर को अपने कष्ट को हृदय के एक कोने में दबाकर नित्य चुस्ती-फुर्ती के साथ खुद को प्रस्तुत करने की प्राथमिकता देनी पड़ती है । इसलिए शिक्षक के पद को कमतर न समझें बल्कि इसे अत्यंत गरिमापूर्ण और प्रतिष्ठित पद मानना ही पड़ेगा क्योंकि समाज में गुरु की महत्ता आज भी सर्वोपरि है और यही वजह है कि कबीर दास का यह प्रसिद्ध दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रचलित है –
“गुरु – गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ॥ ”
Penned by Jayaajitan.
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