72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को हाल ही में वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। सिनेमा में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान और अभिनय कौशल के लिए देश का यह सबसे बड़ा सम्मान दरअसल उन्हें पाँच दशक बाद मिला है। जबकि अनंत नाग जी ने कन्नड़ फ़िल्मों को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है । उन्होंने अपना योगदान ऐसे समय में दिया जब क्षेत्रीय सिनेमा में कहानी बयां करने के नए प्रयोग और एक विशिष्ट सिनेमाई विधा उभर रही थी। अनंत नाग जी फ़िल्म जगत की यात्रा में सबसे अनुभवी कलाकार हैं। उनकी अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा, बारीकियों से भरी अदाकारी और भारतीय सिनेमा, मुख्य रूप से कन्नड़ फ़िल्मों में दशकों की समर्पित सेवा ने हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया है। यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार सिनेमा जगत के उस सदाबहार अग्रणी को नमन करता है जिनका सम्मान होने की प्रतीक्षा बहुत पहले से थी । समानांतर और मुख्यधारा जैसे दोनों ही सिनेमा में अपने स्वाभाविक अभिनय और शानदार संवाद अदायगी से उन्होंने प्रशंसकों के दिलों में विशेष स्थान बना लिया है। साधारण जीवन से मशहूर हस्ती बनने की उनकी यात्रा हर किसी के लिए प्रेरणादायक है।
उन्होंने 1973 में कन्नड़ फ़िल्म ‘संकल्पा’ से फ़िल्मों में डेब्यू किया। जी.वी. अय्यर की 1975 की फ़िल्म ‘हंसगीते’ में कर्नाटक संगीत और अनुशासन को दिखाने वाले उनके किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। श्याम बेनेगल के साथ उनका काम बेमिसाल रहा है, जिसकी शुरुआत ‘अंकुर’ (हिंदी डेब्यू) से हुई और जिसमें ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’ और ‘कोंडुरा’ जैसी फ़िल्में शामिल हैं।
अनंत नाग जी कर्नाटक (कन्नड सिनेमा) से दादा साहब फाल्के पुरस्कार पाने वाले दूसरे अभिनेता हैं । यह सम्मान उन्हें पद्म भूषण मिलने के एक साल बाद मिला है। 1995 में डॉ. राजकुमार को यह सम्मान मिलने के बाद से किसी भी कन्नड़ एक्टर को सिनेमा के क्षेत्र में देश का यह सबसे बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था। अनंत नाग ने पाँच दशकों से ज़्यादा समय में समानांतर और मुख्यधारा जैसे दोनों ही सिनेमा में 300 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया है। नाग का जन्म 1948 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ ज़िले के भटकल गाँव में हुआ था। शुरुआती दौर में उन्हें मुंबई एक अनजान जगह लगी परंतु वहाँ की रंगमंच की दुनिया ने उन्हें बदल दिया । वहाँ उन्होंने सत्यदेव दुबे, गिरीश कर्नाड और अमोल पालेकर के साथ मराठी, हिंदी और कोंकणी भाषाओं के नाटकों में सक्रियता से काम किया। अनंत नाग जी को पाँच बार कर्नाटक राज्य पुरस्कार मिले हैं, जिनमें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी शामिल है। नाग जी खुलकर मानते हैं कि उनका “न्यू वेव” सिनेमा से कमर्शियल सिनेमा की ओर कूच करने का मुख्य कारण अच्छी कमाई थी । उन्होंने कहा, “ज़्यादातर मेरी शुरुआती फ़िल्में न्यू वेव फ़िल्में थीं। मुझे पैसों के लिए कमर्शियल फ़िल्मों में काम करने का कोई अफ़सोस नहीं है। पिछले 50 सालों में मुझे जो भी समानांतर या आर्ट फ़िल्में मिलीं मैं लगातार उनमें भी काम करता रहा।“ नाग जी फ़िल्म की पटकथा के प्रति काफ़ी गंभीर थे । अनंत नाग जी हमेशा से किसी रोल को स्वीकार करने से पहले पूरी पटकथा पढ़ने पर ज़ोर देते रहे हैं, न कि सिर्फ़ अपने हिस्से को देखने पर।
लगभग चार दशकों तक उनके सहज अभिनय, बहुमुखी प्रतिभा और अभिनय कौशल ने भारतीय सिनेमा पर गहरी छाप छोड़ी है। उन्होंने उन नियमों को नहीं माना जो उनके कलात्मक मूल्यों से मेल नहीं खाते थे। उनका ज़बरदस्त अभिनय कौशल, बारीकियों से भरी एक्टिंग और भारतीय सिनेमा, खासकर कन्नड़ फ़िल्मों में दशकों की समर्पित सेवा प्रशंसनीय रही है। उन्होंने कहा है कि उनके लिए अच्छी कहानी और एक्टिंग की गुंजाइश मायने रखती है। उन्होंने कभी भी अपने स्वाभाविक अभिनय को सीमित नहीं बनने दिया। गंभीर या पैरेलल सिनेमा से जुड़े कई अन्य अभिनेताओं ने मुख्य रूप से उसी दुनिया से अपनी पहचान बनाई । लेकिन वे गंभीर, संदेशपरक सिनेमा और मनोरंजक ड्रामा-कॉमेडी फ़िल्मों में सहजता से मुख्य किरदारों से लेकर चरित्र भूमिकाओं को निभाते रहे । उनके किरदारों में अमीरी, अनिश्चितता और नैतिक अस्पष्टता हो सकते थे लेकिन उनका जुड़ाव हमेशा वास्तविक दुनिया से रहता था। अपनी बात कहने के लिए उन्हें शारीरिक हाव-भाव की आवश्यकता नहीं थी केवल एक पल का ठहराव या ज़रा-सी हिचकिचाहट ही काफ़ी थी । कभी-कभार तो बस एक बार देखना ही काफ़ी हो जाता था।हाल ही में, इस एक्टर ने आज के सिनेमा में लेखन की गुणवत्ता में आई गिरावट के बारे में खुलकर बात कही थी । इस बारे में उन्होंने भी यही बताया कि पहले पटकथा किरदार को ध्यान में रखकर लिखी जाती थीं, अब वे विशेष अभिनेता को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं। उनका तर्क है कि इससे दृश्य कमज़ोर हो सकते हैं और अत्यभिनय बढ़ सकता है। यह एक अजीब बात है कि एक अभिनेता की तरफ से यह आलोचना आ रही है जबकि उन्हें ऐसी प्रस्तुति के लिए सम्मानित किया जा रहा है जो पूरी तरह से पटकथा और पात्र पर आधारित है।
यद्यपि उनका मुख्य क्षेत्र थिएटर और सिनेमा था तथापि रामकृष्ण हेगड़े के कहने पर वे राजनीति में शामिल हुए । वे कुछ समय के लिए जनता पार्टी, जनता दल (सेक्युलर) और भाजपा से जुड़े रहे। 1994 से 1999 तक उन्होंने जनता दल पार्टी के साथ एमएलसी, विधायक और मंत्री के तौर पर काम किया। बाद में उन्होंने मल्लेश्वरम निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन पराजित होने के कारण राजनीति छोड़ दी।
अपने दिवंगत भाई शंकर नाग जी के साथ मिलकर उन्होंने टेलीविज़न की दुनिया में कदम रखा और ‘मालगुडी डेज़’ जैसा ऐतिहासिक सीरियल बनाया जो आज भी हमारे समय के सामूहिक अनुभवों को ज़िंदा रखता है । उन्होंने दिखाया कि हुनर, समझदारी और लोगों के बीच लोकप्रियता एक साथ बखूबी मिल सकते हैं ।
एक इंसान के तौर पर अनंतनाग को हमें यह बताने की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी कि वे हमारे लिए कितने महत्त्व हैं। उन्होंने जिन किरदारों को निभाया उसे जीवंत कर दिया, यहाँ तक कि आम आदमी के पात्र को भी बेहद दिलचस्प बना दिया। उन्होंने नाटक में हिचकिचाहट, खामोशी में हास्य, भद्दापन और मनोविकार पाया। वे रोमांटिक हीरो, विदूषक, उलझन में फंसा मिडिल क्लास आदमी, गंभीर ड्रामैटिक किरदार या बुज़ुर्ग नेता कोई भी भूमिका निभाते थे और फिर भी उनमें वही असलियत और विश्वसनीयता बनी रहती थी इसी वजह से वे दादा साहब फाल्के अवॉर्ड के हकदार थे।
Penned by Jayaajitan.
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