रामनारायण मास्टर जी जिला परिषद स्कूल में विज्ञान के अध्यापक थे। वे बहुत ही हँसमुख स्वभाव के थे, इसलिए उनके आसपास बच्चे रहते थे। अपनी कक्षा के बच्चों के प्रति उनका स्नेह देखने लायक था। उनके पढ़ाने का तरीका बहुत ही अनोखा था। जब वे जानवरों के बारे में पढ़ाते थे तो हमेशा बच्चों को यह शिक्षा देते थे कि वे किसी जानवर को तंग न करें। कक्षा में पढ़ाते समय उनकी नज़र हर बच्चे पर होती थी और इसलिए किसी का ध्यान भटकता नहीं था। अगर गलती से ध्यान भटक जाता था तो वे तुरंत उसे पकड़ लेते थे। बच्चे को डाँटने के बजाय वे कुछ प्रश्न पूछते और बच्चे से पाँच बार उत्तर दोहराने को कहते जिसे देखकर दूसरे बच्चे बहुत सतर्क हो जाते थे।
रामनारायण मास्टर जी बाहर वालों से तो बहुत खुशमिजाज थे लेकिन घर में उनका व्यवहार बिलकुल विपरीत था। वे हमेशा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सख्ती से पेश आते थे। इस कारण घर में सभी उनसे हमेशा परेशान रहते थे। वे छोटी-छोटी बातों पर घरवालों से नाराज हो जाते थे। रोज स्कूल से लौटते समय उन्हें थैला भरकर सब्जी लाने की आदत थी, एक दिन यह देख उनकी पत्नी झल्लाकर बोली, “कल जो सब्जी खरीदी थी, वह अभी खत्म नहीं हुई है, और आज फिर थैला भरकर सब्जी लाए हो, अगर ये खराब हो गईं तो पैसे बर्बाद हो जाएँगे, अगर यही पैसे बेटी के डाँस प्रोग्राम के लिए नए सूट खरीदने में खर्च किए होते तो कितना अच्छा होता।” मास्टर जी गुस्से में चिल्लाए, “क्या नृत्य करके ऐश्वर्या राय बन जाएगी? अरे स्कूल का प्रोग्राम है, कहो अलमारी में रखे कपड़ों में से कोई सुंदर ड्रेस पहने, मैं इस सब पर पैसे खर्च करने को तैयार नहीं हूँ ।” कमरे में डाँस का अभ्यास कर रही अनामिका अपने माता-पिता के बीच हो रही बातचीत सुन लेती है । वह डाँस छोड़कर अपने पिता के सामने खड़ी हो गई और रुंधे गले से कहा, “पापा, मैं आपके स्कूल से हूँ। जब आपके स्कूल के बच्चे मुझे ऐसे साधारण कपड़ों में नाचते देखेंगे, तो आपको शर्मिंदगी महसूस होगी।” यह सुनकर उसके पिता बोले, “कुछ माता-पिता ऐसे भी होते हैं जो अपने बच्चों के कपड़ों पर खूब पैसे खर्च करते हैं, लेकिन उनका नृत्य उबाऊ होता है। ऐसे दिखावटी ताम-झाम से क्या फायदा, सिर्फ़ पैसे की बर्बादी होती है।” अनामिका खुद को रोक नहीं पाई और बोली, “पापा, यह डाँस सिर्फ़ मनोरंजन का हिस्सा नहीं है, जबकि यह तो प्रतियोगिता के लिए है। मुझे अपने पहनावे पर भी ध्यान देना चाहिए, कहीं मेरी वजह से मेरा ग्रुप हार न जाए। अगर ऐसा हुआ, तो वे सभी बहुत बुरा मानेंगे।”
कार्यक्रम वाले दिन अनामिका की माँ भी स्कूल आई हुई थी। अनामिका का नृत्य इतना सुन्दर था कि उसे विशेष सम्मान मिला। निर्णायक ने कहा, “अनामिका का नृत्य बहुत ही मनमोहक था, उसके पैरों की हर गति बहुत ही मनमोहक थी, अनामिका अतुलनीय है।” निर्णायक से सम्मान पाकर अनामिका अपने पिता की ओर दौड़ी। मास्टरजी ने अपनी बेटी को गले लगाया और कहा, “मुझे पता था कि मेरी बेटी जीतेगी।” अनामिका ने कहा, “पिताजी! मुझे माफ़ कर दीजिए, उस दिन मैंने नई ड्रेस न खरीदने पर झगड़ा किया था।” मास्टरजी ने अनामिका का सिर सहलाते हुए कहा, “बाहरी दिखावे से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, अपनी योग्यता के आधार पर सम्मानित होना गर्व की बात है, जैसे आज तुम्हें यह सम्मान मिला है।” अनामिका अपने पिता को कसकर पकड़ लेती है और खुद से कहती है कि किसी ने सच ही कहा है कि सत्य ही सुंदर होता है, यानी सत्यम् शिवम् सुंदरम्।
Written by Jayaajitan.
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