नॉर्वेजियन नोबेल समिति के चेयरमैन जोर्गेन वाट्ने फ्राइडनर्स ने 2026 के नोबेल पुरस्कार के लिए दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख रह चुकीं सुश्री नेवी पिल्लै के नाम की घोषणा करते हुए कहा, “दुनिया को यह याद दिलाने के लिए कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून का शासन ही उस व्यवस्था का आधार है जिसे हमने शांति बनाए रखने और बिना हिंसा के विवादों को सुलझाने के लिए बनाया है। शांति के लिए न्याय ज़रूरी है। जजों ने कहा कि दुनिया को ऐसे कानूनविदों की ज़रूरत है जिनमें हिम्मत, महत्त्वकांक्षी और दृढ़ संकल्प जैसे गुण जो नवी पिल्लै बेंच पर अपने काम के दौरान दिखाती रही हैं। उन्होंने इज़राइल और रंगभेद के दौर वाले दक्षिण अफ़्रीका जैसी जगहों पर दुनिया के सबसे दर्दनाक और संवेदनशील कानूनी मुद्दों और सबसे कमज़ोर तबकों से जुड़े मामलों पर काम किया है।
पचासी साल की सुश्री नवी पिल्लई को यह खबर जर्मनी के नूर्नबर्ग में एक फ़ोरम में भाग लेते समय मिली। वहाँ उन्होंने आगाह किया कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय व्यवस्था को कमज़ोर करने के प्रयास नूर्नबर्ग युग के बाद अन्य ऐतिहासिक प्रगति को दांव पर लगाना है। ऐसे में दुनिया के सामने फिर से ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाले अराजक युग में वापस जाने का बड़ा खतरा खड़ा हो जाएगा।
शुक्रवार को यह पुरस्कार जीतने की खबर मिलने के बाद सुश्री पिल्लई की शुरुआती टिप्पणियों में गाज़ा का ज़िक्र था। उन्होंने कहा, “वहाँ जो हो रहा है वह नरसंहार है।” सुश्री पिल्लई ने कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी इलाक़ों और इज़राइल के मामलों की जाँच करने वाले उस आयोग की अध्यक्षता की थी, जिसे यूएन समर्थित मानवाधिकार परिषद ने बनाया था। एक साल पहले आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला था कि गाज़ा में नरसंहार के लिए इज़राइल ज़िम्मेदार था और उसका मक़सद गाज़ा के फ़िलिस्तीनियों को पूर्ण रूप से नष्ट करना था।
नॉर्वे में अवॉर्ड की घोषणा के कुछ घंटों बाद अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन ने आईसीसी पर कई नए और कड़े प्रतिबंध लगा दिए। यह उस ट्रिब्यूनल को समाप्त करने के अभियान का हिस्सा था जिसके बारे में अमेरिका का मानना है कि वह राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर उसने युद्ध अपराधों के आरोपों में अमेरिकियों और इजराइलियों पर गलत तथा गैर-कानूनी तरीके से मुकदमा चलाने का प्रयास किया है।
सुश्री नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को तमिल मूल के एक भारतीय परिवार में हुआ था। वह रंगभेद के माहौल में पली-बढ़ीं और बाद में उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से पोस्ट-ग्रेजुएट की पढ़ाई की। 1995 में उन्हें रवांडा के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल में चुना गया जहाँ उन्होंने 2003 तक दक्षिण अफ्रीका की पहली गैर-श्वेत जज के तौर पर काम किया।
अपने प्रतिष्ठित करियर में उन्होंने न केवल नेल्सन मंडेला जैसे रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं का पक्ष रखा बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून में बलात्कार को परिभाषित करने वाली बेंच में भी शामिल रहीं।
यद्यपि कभी-कभी नोबेल शांति पुरस्कारों की प्रासंगिकता पर सवाल उठते हैं लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य जैसे यूक्रेन पर रूसी आक्रमण और वेनेज़ुएला व ईरान में अमेरिकी हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खुले उल्लंघन को दर्शाता है। ऐसे अशांत समय में, सुश्री नवी पिल्लई को मिला नोबेल पुरस्कार वैश्विक व्यवस्था के महत्त्व और अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति सम्मान की नितांत आवश्यकता को रेखांकित करता है।
‘इंस्टीट्यूट फॉर अफ्रीकन विमेन इन लॉ’ द्वारा प्रकाशित बायोग्राफिकल प्रोफ़ाइल के अनुसार, सुश्री पिल्ले के पिता एक बस ड्राइवर थे जो परिवार का खर्च चलाने के लिए कई तरह के काम करते थे, जबकि उनकी माँ आठ बच्चों की देखभाल करती थीं। वे बहुत गरीबी में पली-बढ़ीं। नेल्सन मंडेला, एफडब्ल्यू डी क्लर्क, आर्कबिशप डेसमंड टूटू और अल्बर्ट लुथुली के बाद वे नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली पाँचवीं दक्षिण अफ्रीकी नागरिक बनीं।
बाद में सुश्री पिल्ले ने यह अवॉर्ड अंतरराष्ट्रीय अपराधों से बचे सभी लोगों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय न्याय के लिए काम करने वालों और उसकी रक्षा करने वालों को समर्पित किया जिनकी दया और हिम्मत यह सुनिश्चित करती है कि दोषियों को सज़ा से बचने नहीं दिया जाएगा।
Penned by Jayaajitan.
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