राम बाबू के दाहिने पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था ।
वह अपने घर के सामने चारपाई पर बैठकर घर में आने-जाने वाले लोगों को अपनी दुर्घटना की कहानी सुनाता था ।इस कारण घर में आने-जाने वालों का ताँता लगा रहता था ।
इस बार राम बाबू के चारों भाई, उनकी पत्नियाँ और बच्चे पहुँचे ।
राम बाबू की तीनों बहनें रोती – बिलखती आईं और रोते हुए छोटे-छोटे बच्चों को उनके पति संभालने में लगे थे । वे सब भाई – बहन आपस में तीन साल बाद मिल रहे थे । राम बाबू और उनके माता – पिता को छोड़कर उनके पुश्तैनी मकान तथा ज़मीन बेचकर पैसे बैंक में डालना चाहते थे । उनके माता – पिता ने उनकी बात का कड़ा विरोध किया । कुछ दिनों के बाद राम बाबू ने अपने बलबूते पर अपने पुश्तैनी मकान को खूबसूरत बनाया । पहले वाला मकान अपनी नौकरी के स्टैटस के अनुसार नहीं था, ‘बड़ी कंपनी में नौकरी तो घर भी बड़ा होना चाहिए ।’ इसी सोच से राम बाबू ने अधिक पैसा लगाया, एक और मंजिल खड़ा किया ।
तब से, त्यौहारों या छुट्टियों के दौरान भाई-बहनों का मिलना – जुलना बहुत कम हो गया । सब अपनी अनुपस्थिति के अपने-अपने कारण बताने लगे थे। शादियों में बुआ, बड़े चाचा, मामाजी या घर के कोई बड़े बुज़ुर्ग ये सारे भाई-बहनों से मिलते समय अपने माता – पिता से मिलने नहीं जाने पर कड़वे शब्दों को उगलते थे । अपने भावावेश में ये भाई-बहनें उल्टा-सीधा बोल देते थे या अनसुना कर देते थे I क्रमशः भाई-बहनों में आपसी मन मुटाव बढ़ गया ।
लेकिन जैसे ही राम बाबू की दुर्घटना का पता चला सब सांत्वना देने के वास्ते अपना काम छोड़कर पुश्तैनी मकान में दौड़े – भागे आए ।
राम बाबू का चेहरा दर्द से तनिक खींचा – खींचा-सा था, परंतु मुख पर खुशियों की झलक भी थी ।
सब अपने बचपन और यौवनावस्था में बिताए गए दिनों की यादों को तरोताजा करने लगे । लेकिन उन्होंने पुराने मकान के नए रूप तथा नए कमरों के निर्माण से खीझकर पिताजी से पूछा, “पापा आपने पुरानी खिड़की क्यों बदली? वह तो अच्छी थी । ” दूसरे भाई ने कहा, “पापा यह नया बरामदा काफी छोटा लग रहा है। आपको भी ऐसा लगता होगा।” पापा सबकी बात को चुपचाप सुनते रहे और किसी का भी जवाब नहीं दिया। इसी बीच उनकी माँ ने बात को रोकते हुए कहा, ” तुम सब पुराने घर को तुड़वाना चाहते थे और खाली ज़मीन को बिल्डर को बेचना चाहते थे । लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना किया। इसलिए आज तुम सबको अपने गाँव में रहने की जगह मिली और अपने पुश्तैनी मकान में आने का अवसर मिला। अब घर में खुशियों का मेला जैसा है । हमारे मरने से पहले तुम सबका आपस में मिलना – जुलना अच्छा लग रहा है ।”
इसी बीच राम बाबू की पत्नी के भाई का फ़ोन आया कि चारों भाई अपने परिवार सहित राम बाबू का हाल पूछने आ रहे हैं ।यह सुनकर राम बाबू की पत्नी, उनके बच्चे और राम बाबू के माता-पिता बड़े खुश हुए किंतु बाकी सबका मुँह उतर गया था।सबकी यही दिक्कत थी कि यदि वे सब आ जाए तो घर में रहने के लिए उतने कमरों का अभाव है । राम बाबू के पिता ने बहुत ही प्रसन्नतापूर्वक उठकर सोफे पर बच्चों के बिखरे सामान को इकट्ठा किया और कहा, “बहुत ही दिन हो गए छोटी बहू के परिवारवालों से मिले हुए , अच्छा हुआ उनसे इस बहाने मिलना हो पा रहा है । बहू का परिवार स्नेह संपन्न है, बड़ों का बहुत ही आदर करते हैं और यह सब उनसे सीखना चाहिए ।” राम बाबू के पिता हमेशा अपने बेटों की तुलना छोटी बहू के भाइयों से करके अपने ही बेटों का उपहास करते थे । किंतु इसके विपरीत में उन्हीं का बेटा रामबाबू अपनी ही पत्नी का उपहास करने में माहिर था ।
सचमुच में राम बाबू की पत्नी राधा एक चलती – फिरती गुड़िया थी । वह अपनी ज़ुबान किसी के द्वारा कुछ पूछे जाने पर ही खोलती थी जिससे ऐसा लगता था मानो वह गूँगी हो। वह चार भाइयों की इकलौती बहन जो प्यार- ही-प्यार में पली और बड़ी हुई थी ।वे अपनी बहन को परेशान नहीं करना चाहते थे इसलिए पास के एक होटल में कमरा लिया था । भाइयों ने यह तय किया था कि वे केवल राधा के पति से मिलने जाएँगे और आवश्यकता पड़ी तो सहायता करेंगे । राधा की चुप्पी इन भाइयों को चुभती थी क्योंकि राम बाबू राधा
की अवहेलना करना तथा मज़ाक उड़ाने की आदत से नहीं चूकते थे। रामबाबू तो उसकी पत्नी का कठपुतली बने रहना पसंद करता था और बिचारी राधा ने कठपुतली बने रहना ठान लिया था क्योंकि उसे लगा था कि परिवार चलाने के लिए मूक और बधिर रहना ही बेहतर है।
राम बाबू के टूटे पैर में दर्द के कारण वह बेचैन रहता था । हर कोई सुबह से लेकर रात तक आपस में बातें करने में मज़ा लेता था । राधा चुपचाप दिन-रात इन्हें खिलाने-पिलाने का काम करती थी । इस परिस्थिति में भी अपनी शारीरिक परेशानी को भुलाकर अपने पति का पूरा ध्यान रखती थी । रात को बिस्तर पर लेटते समय राधा का पूरा शरीर थकान से टूट जाता था । परंतु उसने अपने पति के पैर पर बंधे प्लास्टर को देखा तो हिम्मत मिलती थी । वह स्वयं से कहती थी, “मेरे शरीर के किसी भी हिस्से पर प्लास्टर नहीं बंधा है तो मैं क्यों आराम करूँ, मेरा काम तो काम करते ही रहना है ।“
वह पूर्ण उत्साही बनकर अगले दिन अपने काम में लग जाती थी ।
Written by Jayaajitan.
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