स्वर्ण स्वरूप की प्रतिमा
कला विभूषित थी प्रतिभा
रंग रूप कला से समृद्ध
विजय गाथाओं से प्रसिद्ध
ज्ञान की मूरत,बुद्धिमति
हर विषय में पूर्णांक की मति
शास्त्र का ज्ञान था भरपूर
भाषण कला में दृढ़ स्वर
हर क्षेत्र में सहज सरल भाव
मात, पिता, गुरु को नमन भाव
भाव देख प्रभु की बनी वह इष्ट
कम उम्र में ही थी बहुत ही शिष्ट
विधि की कालिमा ऐसी छाई
जिस राह में जन्मी थी, वहीं मृत पाई
जन्म का कारण तो प्राप्त उत्तर
पर मौत का कारण आज भी निरुत्तर ll
Written by Jayaajitan.
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