लेख: हवाई चप्पल

समाचार पत्र केवल खबरें नहीं देते बल्कि भाषाई अलंकारों से संवारकर पाठकों के समक्ष रखते हैं। उसे पढ़कर पाठक अपनी मेधा के अनुसार उनका अर्थ ग्रहण करते हैं। यहाँ कुछ पाठक लेखक की बात से सहमत हैं तो कुछ अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अलग दृष्टिकोण रखते हैं। इसी तरह अखबार के कार्टून अपने कथन को स्केचिंग की अभिव्यक्ति के माध्यम से दर्शाते हैं l हालाँकि कार्टून के संवाद हमारे दिलोदिमाग को झकझोर देते हैं l हाल ही में चुनाव नतीजों के बाद अखबार में छपे एक कार्टून ने लोगों की कथा और व्यथा को बखूबी दर्शाया। उस कार्टून में दो लोग (एक पुरुष और स्त्री) पूरी तरह घिसी हुई हवाई चप्पल को घूर रहे थे। पुरुष का डायलॉग था, “घिस तो पूरी गई है, पर अफ़सोस कि इसने कभी कोई सार्थक कदम नहीं उठाया” और स्त्री का डायलॉग था, “ऐसा काम अगले आने वाले न करें तो अच्छा है I”

यह चप्पल उस कार्टून में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण संदेश के प्रतीक रूप में दिखाई गई है जो  मनुष्य के सारे कर्मों को उजागर करती है l वह चप्पल एक ज़माने में सबसे साधारण व्यक्ति जिसे आज की भाषा में आम आदमी कहते हैं – उनकी पहचान थीं । 

इसे यूँ कहा जा सकता है कि वह जानी-मानी महिला, अपने आपको आम लोगों में से ही एक मानती थीं और दिखावे से कोसों दूर थीं । इन दोनों को अपने जीवन के प्रमुख सिद्धांत मानने वाले किसी घिसी-पिटी वस्तुओं की गारंटी खत्म होने पर भी नहीं त्यागते और वह घिसी-पिटी चप्पल इसी मानसिकता का प्रतीक है  जो आम आदमी सालों से एक ही ब्रांड की हवाई चप्पल पहनता हो और अधिक चलने का आदी हो तो वाकई वह पूरी तरह घिस जाती है। अच्छे ब्रांड की हवाई चप्पल की पट्टियाँ जल्दी नहीं टूटतीं, लेकिन अधिक उपयोग से ढीली हो जाती हैं। इससे पहनने वाले को चलने में असुविधा तो नहीं होती। 

सच कहा जाए तो चलते समय उनकी चप्पल की कर्कश आवाज़ का उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेना नहीं हैं बल्कि दूसरे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाए कि इतने बड़े व्यक्ति ने आम आदमी की चप्पल पहनी है और वह चप्पल भी घिस-घिसकर फेंकने लायक हो गई है । इनके चप्पलों को देखकर आम आदमी खुश है क्योंकि ये हमें समझते हैं और हमारी मुश्किलें इन्हें बर्दाश्त नहीं होतीं।  

वास्तव में देखते-ही-देखते ऐसा बुरा वक्त आ गया है कि लोगों को अब अपनी तनख्वाह का आधा हिस्सा खर्च करने की नौबत आ गई है । यह खर्च भी केवल बुनियादी खाने-पीने की चीज़ों में हो रहा है  क्योंकि हरी सब्ज़ी से लेकर गेहूँ, दाल और चावल की कीमतों ने बचत का विकल्प ही खत्म कर दिया है । हवाई चप्पल पहनने वाले बड़े- से- बड़े जन सेवकों ने आम आदमी को महँगाई की मार से बचाने का ठेका लिया था ऐसा मानना सबकी गलतफहमी थी ।  इन लोगों ने महँगाई के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठाई बल्कि आवाज़ सुनाने का महज ढोंग रचते रहे।

आजकल बाज़ार में यह दृश्य आम हो गया है कि आम आदमी सिर्फ़ महँगी दरों की ही नहीं बल्कि दुकानदार डबल रुपए में सामान बेचकर  ग्राहकों को गालियाँ भी देते हैं। आम आदमी अब चप्पल की मार से ज़्यादा इन गालियों के शिकार हो रहे हैं। लेकिन इस बेबसी के बीच ‘रबड़ की चप्पल’ पहने हुए बड़े जन सेवक आम आदमी की समस्याओं को समझने में पूरी तरह विफल रहे । आखिरकार समाचार पत्र ने इसका खुलासा अपनी खबरों में छापकर और सोशल मीडिया ने रील्स बनाकर उनके खोखले विचारों और धोखेबाज़ी का पर्दाफाश कर ही दिया । दशकों तक इसी ‘घिसी – पिटी चप्पल’ सादगी के नाम पर सत्ता पाने वाले लोग और वे  दिखावे के द्वारा महाप्रदर्शन का दावा कर रहे थे ।

 अंततः लोगों को समझ में आ गया कि वास्तविक मूल्यों से दूर हवाई चप्पल पहने पैर चल नहीं रहे थे जो केवल हवा में आवाज़ बना रहे थे। जबकि इस तरह की आवाज़ आम जनता को कोई लाभ नहीं पहुँचाती है। यदि हवाई चप्पल के धारक महँगाई को रोकने के लिए उस मुकाम तक चलकर जाते जहाँ महँगाई ने समूचे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया था तो शायद स्थिति बदल जाती। यदि वे ऐसा करते तो सचमुच आम जनता के चहेते बन जाते, अपनी आवाज़ और अपना अगुआ मानते। उनकी तरफ़दारी में खड़े होकर लोग उन्हें जनसमूह का रक्षक मानते। किंतु अपने मानकों के अनुरूप हवाई चप्पलधारी न चलने पर जनता ने सामने खड़े व्यक्ति को अपनाने से इनकार कर दिया। परिणामतः जनता ने उन्हें अपने हृदय से उतार दिया। अब रही बात जनसेवक की तो आम आदमी ने एक नए विकल्प को चुना है ताकि वह ठगा न जाए, घर का खर्च चलाने के साथ पैसे बचा सकें और बेहतर जीवन जी सकें । अब यह समय ही बताएगा कि वे जनता की उम्मीदों पर कितने खरे साबित होते हैं । 

Penned by Jayaajitan.

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