अरुणिम सूरज कहे,
मुड़कर देखो जरा,
पीछे छूटी तुम्हारी,
अपनी ही दुनिया।
जिसने बनाया वजूद
त्यागा उसे,
रसीले जीवन के
अधूरे ख्वाब में।
देखो,
कल भी लाल था मैं,
आज भी हूँ लाल,
रहूँगा आगे भी लाल,
नहीं बदला मैंने रूप-रंग,
निज सत्ता के मान में।
Written by Jayaajitan.
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