लेख: कामवाली

हम कोई कामचोर नहीं है । बस अपने घर के काम को सुचारू रूप से करने में अक्षम है। हमेशा घर का काम अधूरा रह जा रहा है । इसका कारण है — समय का अभाव । अपने घर के काम के लिए समय क्यों नहीं पर्याप्त हो रहा है । इसका कारण अपने कार्यालयीन कर्तव्य एक अड़चन बनी है । इस पर निरीक्षण किया तो नौकरी पेशा से हर काम व्यवस्थित रूप से करने पर भी घर के काम में समय बस नहीं हो रहा है । इस वजह है घर में कार्यालयीन काम को देने की आदत बनी । घर में कार्यालय काम में व्यस्त देखकर घरवालों ने कहा घर का काम, घर में और कार्यालय का कार्य, कार्यालय में । इसी तर्क में घर का काम में तथा कार्यालय के काम में उथल-पुथल होने लगा। इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने पर भी नहीं मिला । निरुत्तर मन ने दूसरों के सुझाव को मानने के लिए बाध्य किया कि एक कामवाली को रखा जाए । अपनी पड़ोसन से कामवाली का इंतज़ाम करने का अनुरोध किया गया। उन्होंने अगले क्षण ही एक कामवाली को भेजा । उसने अपने बड़े-बड़े प्रस्ताव रखें l कामवाली की बातें सुनकर सर चकराया । उसने सुबह की सूची में आते साथ गरम-गरम चाय पिलाने के काम को हमें सौंप दिया ।वह घर का झाड़ू -पोछा लगाने से लेकर कपड़े धोने के काम के लिए तैयार हुई ।महीने का पगार 5000 रुपए रखा गया । त्योहारी के पैसे अलग देने क माँग हुई l सुबह का काम नहीं जमा तो शाम के समय आने लगी । जैसे-जैसे मेरे तनख्वाह में डीए बढ़ता गया वैसे-वैसे वह भी अपने तनख्वाह में सौ-सौ रुपए बढ़ाती गई । मैं अपने कामवाली की हर फर्माइश पूरा कर देती थी । कभी-कभार मुझे लगता था कि चुपचाप उसे उसकी हर बात को सहन कर रही हूँ तो क्या वह मेरा शोषण कर रही है ? वैसे तो मैं पिछड़े वर्गों के शोषण की कहानी- कविता आदि पढ़कर सबको सम भाव से देखने की चेष्टा रखती हूँ । उनसे अनुकंपा भरे शब्दों को आवश्यक ही नहीं अनावश्यक जगह पर भी प्रयोग करते हुए अपने आपको कामवाली के अधीन बना लिया था । ऐसा करते-करते एक साल की कमाई का आधा हिस्सा कामवाली को भी चढ़ाना पड़ रहा था l उसका काम भी उतना संतोष भरा भी नहीं था । इसलिए भाड़ में जा कहने की हिम्मत न होने के कारण सदा यही लगता था कि अब जमाना कामवालियों का है । इसलिए अपना मुँह बंद रखना बेहतर है जिससे मैं काम चलाती रही ।

मेरे बचपन में घर के काम करती “आई माँ” को दूसरे लोग बाई पुकारते थे । किंतु मेरे पिताजी बड़े- बुज़ुर्गों का मान मर्यादा रखते थे तो उन्हें दादी माँ कहने के पक्ष में थे । इसलिए हमें दादी माँ बुलवाया गया । वे खुद उन्हें ताई बुलाते थे जिसका अर्थ है माँ l इन्हें हम अपने घर का सदस्य मानते थे l उनके मरने तक वे हमारे घर बड़ी सुकून से रहीं l उनकी बहू ने उन्हें अपने साथ रखने से मना किया तो घर के काम में लगी ताकि अपना बसेरा कर सके । यहाँ पर अपना घर बसाने से अधिक अपने पेट को पालने की भावना रखती थी । इसलिए हमारे घर को अपना घर मानकर पूरे मन से काम करती थीं । उसी तरह मेरे पति के घर के काम में अपने कंधों में लेने वाली महिला की उम्र लगभग साठ की थी । फिर भी पूरी चुस्ती के साथ काम करती थी । सबको बड़े प्यार से खिलाती और भोजन भी स्वाद भरे होने के कारण स्वादिष्ट भोजन की महारानी थी । उनकी जिम्मेदारी से पूरे घर में बहुत आराम था । उनके द्वारा मेरी सास को हर काम व्यवस्थित रूप में मिलता था जो सासु माँ के लिए नामुमकिन था। हमेशा सासू माँ ने अपने बच्चों को उनकी सहायता करने के लिए कहती थी । मेरे पति और दूसरे भाई कदाचित उन्हें मदद करने से पीछे नहीं हटते थे जबकि उन में होड़ रहती थी । उन्हें वह सब “अम्मापिला” पुकारते थे ।

घर के काम में मदद करने वालों को नौकरी की हैसियत देखना हम पर निर्भर करता है । जिस तरह नौकर के प्रति हमारा नज़रिया होता है उसे उसी रूप में हम अपनाते हैं । लोगों का मानना है कि नौकर हमारा सेवक होता है इसलिए वे स्नेह — अनुकंपा के पात्र नहीं होते हैं । ऐसी विवेचना से ही समाज पलता आया है फिर भी कइयों ने अपने नौकर को काका- चाचा कहकर अपने घर के सदस्य मानकर घर में स्थान दिया है । इस स्थान को बनाने या बिगड़ने का केवल परिचायक का दायित्व नहीं जबकि हमारा फर्ज बनता है l उनकी गरीबी का नाजायज फायदा हमें नहीं उठाना चाहिए l संभावना है कि नौकरों के प्रति जुल्म ने उन्हें कठोर हृदय बनाकर केवल काम और वेतन से मतलब रखने वाले बना दिया है । उनको पीड़ा देकर अपना काम लेने वालों के सामने झुकने वाली पीढ़ी की दुर्लभता ने घर के काम में हाथ बंटाने वाले ने नया रूप लिया है — ‘केयरटेकर’ यानी घर के काम की देखरेख । ऐसी स्थिति में बड़े-बड़े कंपनियों की सफाई में कर्मचारी बनने की उम्मीद होने पर भी वह हमारे घर का काम का दायित्व निभाने आती है । वह हमारी कामवाली बनकर आती है तो हमारा दायित्व उन्हें दीर्घकाल तक अपनी सहायिका का दर्जा देते हुए रखना ही हमारा बड़प्पन दर्शाता है ।

Written by Jayaajitan.

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