कविता:प्रकृति के बल

नीले गगन को बदल डालो,

तमाम रंग उनमें भर डालो ।

धरती बदली, पर्वत बदला,

बदला मनुष्य ने अपने हाथों के बल ।

प्रकृति को बलहीन, अक्षम मानना,

मनुष्य के भविष्य का अंत करना ।

रोष और जोश की इस निरंतरता से,

हार रहे हैं हम प्रकृति के प्रकोप से ।

हे मनुष्य ! अब तो जाग जा,

मत रह अपने अहंकार में लीन ।

चलें हम प्रकृति की ओर,

क्योंकि टिका है हमारा जीवन

मात्र प्रकृति के बल पर ।

Penned by Jayaajitan.

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