मनोहर के विद्यालय में वार्षिकोत्सव की तिथि की घोषणा हुई कि सारे विद्यार्थी और अध्यापकगण सतर्क हो गए l अध्यापक गण को कौन-कौन से कार्यक्रम की तैयारी करवानी है, छात्रगण कौन-कौन से कार्यक्रम में भाग लेंगे… l इस तरह पूरे विद्यालय में वार्षिकोत्सव से संबंधित चर्चाएँ तथा बातचीत करने का माहौल दिखा l मनोहर की बहन सुनंदा उछलती- कूदती हुई घर पहुँची कि अपनी माँ को नृत्य में भाग लेने के बारे में बताकर बहुत ही उत्साहित दिखी, जबकि मनोहर बहुत ही गुमसुम था l माँ ने पूछा, “मनोहर ! तुझे टीचर ने कौन से प्रोग्राम में लिया है ?” उसने सिर हिलाकर नहीं का भाव दर्शाया l माँ भी थोड़ी उदास हुई, पर बिना दर्शाते हुए मनोहर को अपने बाजू में बिठाकर समझाया कि अभी समय है l सारे कार्यक्रम एक ही दिन में तय नहीं होते l दो-तीन दिन में तुम्हारी मैडम तुम्हें किसी-न-किसी कार्यक्रम में ज़रूर लेंगी l मनोहर की आँखों में आँसू भरे थे,पर वह आँसू न टपकाने की कोशिश भी कर रहा था l सुनंदा कार पोर्च में खड़े होकर नाचने लगी l उसकी टीचर ने डाँस का केवल एक स्टेप सिखाया था l उसका अभ्यास करने का तरीका देखकर माँ व उसके भाई को हँसी आईं पर दोनों उसका नृत्य देखने को उत्साहित दिखे l
मनोहर हर दिन स्कूल जाता और कक्षा में अपनी टीचर का इंतज़ार करता था कि कोई आए और उसे किसी कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर दें l इसी प्रतीक्षा में हर कक्षा में विचलित मन से बैठता था l हरेक अध्यापक अपने-अपने विषय पढ़ाने आते थे और चले जाते थे l एक विषय भी उसके दिमाग में नहीं बैठा क्योंकि मन में तो एक ही शब्द बार-बार गूँज रहा था- वार्षिकोत्सव, वार्षिकोत्सव l इस तरह सोमवार से लेकर शुक्रवार तक दिल थामे बैठा रहा पर उसे भाग लेने का बुलावा नहीं मिला, लेकिन शुक्रवार को आखिरी कक्षा की घंटी बजी कि सुहासिनी मैडम अचानक कक्षा में आई और कहा,” प्यारे बच्चो, मैं अपने नाटक में कुछ बच्चों को लेना चाहती हूँ, डॉक्टर का किरदार हैl” सुहासिनी मैडम अपनी बड़ी सुंदर आँखों को गोल-गोल घुमाकर किरदार के लिए उचित छात्र को ढूँढ रही थीं I मनोहर का चेहरा सुहासिनी मैडम की आँखों पर पड़ने के लिए उसने थोड़ा उचककर देखा l सुहासिनी मैडम को मनोहरपर गुस्सा आया उन्होंने चिल्ला कर कहा,”मनोहर, तुम्हें तमीज नहीं है जब मैं एक काम कर रही हूँ तो तुम अड़चन पैदा क्यों कर रहे हो?” मनोहर को बहुत खराब लगा l वह समझ गया उसने गलत काम किया है, जैसे ही वह सुहासिनी मैडम से माफ़ी माँगने के लिए दोबारा उचककर देखा तो उसे सुहासिनी मैडम से फिर डाँट पड़ी l मनोहर का सॉरी शब्द गले में अटक गया I कुछ क्षण बाद सुहासिनी मैडम ने कहा, “ रामकृष्णा, तुम डॉक्टर का किरदार करोगे l तुम बहुत ही अच्छे लड़के हो l” कक्षा में मनोहर के सिवाय सारे बच्चे रामकृष्णा को देख रहे थे l छुट्टी की घंटी बज चुकी थी पर मनोहर वहाँ से उठा नहीं I जब स्कूल की आया अम्मा ने घर जाने के लिए कहा तभी उसे स्कूल खत्म होने की बात सूझी I
मनोहर स्कूल बस में बैठा ही था कि बस ड्राइवर ने मनोहर को डाँटा और कहा, “ क्यों देर लगा दी, हम सब तेरा इंतज़ार कर रहे थे, देख तेरी वजह से आज सब घर देर से पहुँचेंगे l” सुनंदा ने अपने भैया को गुस्से से देखा l मनोहर को कुछ समझ में नहीं आया, वह सोचने लगा कि उसने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा तो सब क्यों उसे यूँ घूर रहे हैं l मनोहर बिना समझे कातर आँखों से सब की तरफ आँखें चलाईं l वह सोचने लगा हर दिन मैं स्कूल आता था ताकि किसी कार्यक्रम में मेरा नाम भी जुड़ जाए, पर रामकृष्णा का नाम आ गया, जो चार दिन बाद स्कूल आया, किसी की शादी में गया था, वह मुँह तक नहीं खोलता, चेहरा ऐसे बनाकर बैठता है मानो मुँह में लड्डू ठूसकर रखा हो l वैसे तो वह डायलॉग भी बोल नहीं सकता, याद्दाश्त कमज़ोर है l मनोहर इसी बात को मन में बार-बार दोहरा रहा था, जब सुनंदा ने मनोहर के बस्ते को खींचा तभी पता चला कि बस उसके घर के सामने पहुँच गई है l उसे फिर से ड्राइवर अंकल ने डाँटा और बोला,”मनोहर,तुम कहाँ की ज़मीन खोद रहे हो, शायद चाँद की…”l बस में बैठे सारे बच्चे और शिक्षकगण ठहाका मारकर हँसने लगे l मनोहर चुपचाप उन सब को शर्म भरी आँखों से देखा और अपना बस्ता लेकर नीचे उतर गया l
आँगन में खड़ी माँ को देख मनोहर अपना बस्ता वहीं फेंक कर लिपट गया l वह रोता हुआ बोला,” माँ, आज रामकृष्णा को सुहासिनी मैडम ने नाटक में लिया है, वह तो चार दिन बाद स्कूल आया फिर भी…l” वह सुबक- सुबककर रोने लगा l माँ ने उसके सिर पर हाथ फैरकर कहा, “अरे मनोहर,यह तो भगवान की मर्ज़ी है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते l दादी हमेशा बोला करती है ना – दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम l” मनोहर थोड़ा संभल जाता है क्योंकि जब भी दादी के साथ खाने के लिए बैठता है तो खाना कुछ गिर जाए तो दादी हमेशा समझाती है कि उस दाने पर तेरा हक नहीं था, चींटियाँ या चिड़ियों का हक था इसलिए गिरा l दादी हमेशा सांत्वना भरे शब्दों से उसके उदास मन में स्फूर्ति पैदा करती थी I मनोहर गाँव गई दादी को स्कूल के वार्षिकोत्सव के बारे में बताना तो चाहता था पर वह किसी भी प्रोग्राम में नहीं है यह कैसे बताएँ, इसी उलझन में था कि माँ ने दादी को फोन लगाया और मनोहर के हाथ में थमा दिया l बस अपनी बात करते-करते मनोहर रोने लगा और कहा,” टीचर ने मुझे वार्षिकोत्सव में नहीं लिया जो स्कूल नहीं आता था उसे ले लिया l दादी माँ ने कहा, “ मनोहर बेटा, क्यों रोते हो, वार्षिकोत्सव कल- परसों तो नहीं हैl दो हफ्ते के बाद ही है ना, अभी और समय है, तेरा नाम ज़रूर आएगा, तू सबर कर बेटा l हर बार मैं यही कहती हूँ ना दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, तेरा भी समय आएगा l” दादी से बात करने पर मनोहर को दिलासा मिल गई l उसने ठानी कि वह छुट्टी नहीं लेगा, हर दिन स्कूल जाएगा, और तब तक किरदार मिलने की प्रतीक्षा करेगा l
दुर्भाग्यवश रविवार को मनोहर फिसल कर गिर गया और उसके हाथ- सिर पर चोट लगी। माँ उसे अस्पताल ले गई और डॉक्टर ने उन चोटों की सिलाई की, फ्रैक्चर होने की वजह से हाथ पर भी पट्टी बाँधकर आराम करने की सलाह दी गई l अगले दिन सोमवार को मनोहर ने स्कूल जाने की जिद की तो माँ मान लेती है और सुनंदा को अपने भैया का ख्याल रखने को कहती हैं l
सुनंदा स्कूल की हर घंटी बजते ही अपने भैया की कक्षा की ओर झाँकती है और मौका मिलने पर हाल भी पूछ लेती है l इस तरह एक हफ्ता भी बीत जाने पर भी मनोहर को किसी भी टीचर ने अपने कार्यक्रम में नहीं चुना l हर दिन मनोहर घर वापसी के समय हर टीचर को देखकर मुस्कुराया करता था, उसे लगा कि ऐसा करने से शायद वे टीचर याद कर कार्यक्रम में उसका नाम जोड़ेंगे l बुधवार को भोजन करते समय सुहासिनी मैडम दौड़कर आईं, मनोहर को ध्यान से देखा और कहा, “तू ही मनोहर है ना, पिछले साल मेरे नाटक में भिखारी बना था, इस बार भी तुझे भिखारी बनना है, क्या तू तैयार है ?” मनोहर हाँ या न बोलने से पहले ही आसपास खड़े बच्चे भिखारी – भिखारी बोलने लगे l सुहासिनी मैडम ने उन सबको डाँटा, वहाँ से भगाया और कहा, “मनोहर, देख किरदार छोटा है, पर दमदार है l तेरे डायलॉग से ही नाटक हृदय स्पर्शी बनेगा l” सुहासिनी मैडम ने बस इतना कहा कि वह खुश होकर सुहासिनी मैडम से दस बार धन्यवाद कहा l जैसे ही घंटी बजी वह दौड़कर सुहासिनी मैडम के पास पहुँचा और अपने किरदार में जो बोलना है उसे उतारने के लिए अपनी कॉपी- पेंसिल निकाल कर लिखने के लिए तैयार खड़ा रहा, लेकिन सुहासिनी मैडम ने डायलॉग लिखाने की बजाय इशारा किया कि कल लिखाएँगी, तब से मनोहर को कोई जादुई छड़ी मिलने जैसा आभास हुआ l
मनोहर सुबह-सुबह उठकर अपने डायलॉग और अभिनय का अभ्यास करने लगा l वार्षिकोत्सव के दिन रंगमंच में आने से पूर्व माँ, पापा, दादी और भगवान को याद करके स्टेज पर एक पैर से लंगड़ाते हुए पहुँचा I वह भिखारी के वेश में और हाथ में एक चाकू लिए बोला, “मुझे अपने राष्ट्र के लिए मरना है, यदि मैं नहीं मरूँगा तो झूठ जीवित रहेगा, सच के लिए मरना है, सच्चाई का बलिदान करना है”, चाकू से अपने आप को घोंपकर बोला, “जय भारत माता – जय भारत माता l” तब पर्दा गिरता है l
यही नाटक वार्षिकोत्सव का आखिरी कार्यक्रम था l स्टेज पर विराजित मुख्य अतिथि को अपनी राय देने के लिए आमंत्रित किया गया l उन्होंने सारे कार्यक्रम की सरहाना करने के बाद अतिथि सम्मान में प्राप्त उपहार हाथ में लेकर कहा,”आज मैं अपना इस विशेष उपहार उस बच्चे को देना चाहता हूँ जिसने भिखारी के कथा पात्र को बड़ी तन्मयता के साथ प्रस्तुत किया था l उसने अपने किरदार से नाटक को जान दी है I उसका एक पैर बंधा था l मुझे पता चला कि किसी ने भी उसे पैर बाँधने के लिए नहीं कहा, उसने खुद एक पैर बाँधा ताकि किरदार और अधिक स्वाभाविक लगे, मैं बहुत गौरवान्वित हूँ l” मनोहर को रंगमंच पर बुलाया गया और स्वयं अतिथि ने उसे उपहार दिया तथा फोटो खींची l दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच से मनोहर के पापा, माँ और सुनंदा हाथ हिलाकर वे सब अपनी खुशी का इज़हार कर रहे थे I
अगले दिन हर मुख्य समाचार पत्र में मनोहर की फोटो के साथ भिखारी के किरदार की ख़बर मुख्य अखबारों में छपी I स्कूल में भी हर कोई मनोहर की प्रशंसा कर रहे थे l उसने दादी को अपनी फोटो सहित समाचार का अंश दादी के व्हाट्सएप में भेजा और फोन में सारी बात बताई l दादी बहुत खुश होकर दादी ने बस इतना कहा, “ बेटा, हमेशा याद रखना, दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम l” मनोहर वहीं खड़े – खड़े सोचता है कि हम अपने उतावलेपन से दूसरों को कष्ट देते हैं और खुद को भी कष्ट मिलता है l
Written by Jayaajitan.
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