कविता: दादाजी का एटीएम

दादाजी की पोटली,

हरदम भरी ही भरी,

लटका दी जाती थी,

घर के बड़े बरामदे में l

आने – जाने वाले हाथ,

डालकर लेते ही देखा,

न देखा कभी किसी को,

डालते  पैसा उसमें l

देखने पोटली में कितने पैसे,

बहुत मेरी जिज्ञासा थी,

पर मैं स्तब्ध थी जब देखी,

रुपए-सिक्कों की भरमार उसमें l

गाँव में होती थी चर्चा,

पोटली पर दादाजी की,

मगर सेवा में जन-जन की

नहीं मिली पद्मश्री उन्हें

लुटेरों ने चकमा देकर,

लूटा एटीएम का सारा माल,

अब दौड़ रहे हैं इधर – उधर

सब अपनी जान बचाने की  l

छपी ख़बर एटीएम में चोरी की,

याद आई दादाजी की पोटली,

नहीं था कोई निगरानी करने को ,

फिर भी महफ़ूज़ थी उसमें पूरी राशि जो l

नहीं चुराए आने-जाने वालों ने,

भरोसे भरे अपने हाथों से निकाले,

माँग थी जितनी बस उतने पैसे,

माना फिर ईश का प्रसाद उसे  l

Penned by Jayaajitan.

Please comment your views to: jayaajitan@gmail.com

Leave a Reply