शिक्षा पाना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति समाज को उन्नत करे या न करे लेकिन उसके पास पढ़ाई का प्रमाण पत्र होना आवश्यक माना गया है । इस मत को परिपुष्ट करने में अभिभावक का सबसे बड़ा योगदान है। जो माता-पिता शिक्षा को बुद्धि और आर्थिक विकास का माध्यम मानते हैं l वे जानते हैं कि शिक्षित व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान रखने में सफलता पाते हैं। उनमें सही या गलत को परखने व पहचानने की क्षमता होती है। शिक्षित लोगों का समूह ही राष्ट्र की वास्तविक पहचान बनता है। ऐसी महान विभूतियों से प्रेरित होकर माता-पिता अपनी संतान को अच्छी शिक्षा देने के लिए तत्पर रहते हैं। चूँकि शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है इसलिए इसे सुनिश्चित करना हर माता-पिता का कर्तव्य है। इसी वजह से वे अपनी पूँजी लगाकर पढ़ाने के लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं l हालाँकि, माता-पिता अपनी आर्थिक क्षमता से भी बढ़कर अपनी संतान को शिक्षा देते हैं। आर्थिक स्थिति खराब होने पर वे ब्याज पर पैसे लेकर भी अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। खाने-पीने के लिए अभावग्रस्त होने के बावजूद वे अपने कर्म और कर्तव्य से पीछे नहीं हटते हैं।
आदर्श और कर्तव्यनिष्ठ संतान अपने माता-पिता की पीड़ा से भली-भाँति अवगत होती है। उनमें से कुछ संतानें अपने माता-पिता के स्वभाव के अनुकूल ढलने के लिए तैयार रहती हैं। वे उनकी कड़ी मेहनत से अच्छी शिक्षा प्राप्त करती हैं। यह सच है कि अच्छी शिक्षा व्यक्ति को जीवन में स्थिरता और कमाई का मार्ग प्रदान करती है, जिससे वे अपने माता-पिता की खोई हुई संपत्ति वापस दिलाने में भी समर्थ हो जाते हैं। माता-पिता को संतुष्ट रखने के लिए संतान में आजीवन उनकी देखभाल करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। शिक्षित व्यक्ति अपने माता-पिता के त्याग से प्रेरित होकर उन्हें हर सुविधा दिलाने में जुटे रहते हैं। ऐसी संतान हर माता-पिता का भाग्य मानी जा सकती है, जो उन्हें सुख-समृद्धि के सर्वोच्च शिखर पर ले जाना चाहती है। वे जीवनपर्यंत अपने माता-पिता को ऐश्वर्यपूर्ण जीवन प्रदान करने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसलिए शिक्षा के महत्त्व को समझने वाले माता-पिता जो बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं वे बदले में दोगुना नहीं बल्कि चारगुना सुख-समृद्धि पाते हैं। ऐसे बच्चे को उत्तम शिक्षा दिलाने में कोई कसर न छोड़ने वाले माता-पिता के लिए यह कहावत बिल्कुल सटीक है— “होनहार बिरवान के होत चिकने पात।” इस कहावत के माध्यम से यह चरितार्थ होता है कि सुशिक्षित और गुणवान संतानें अपने परिवार का उद्धार करती हैं। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के माध्यम से अपनी गरीबी का उन्मूलन कर पाते हैं। वास्तव में, ऐसे कई परिवार उभरकर सामने आते हैं जहाँ अभिभावक अपने बच्चों को केवल संतान नहीं बल्कि अपने भविष्य की सबसे बड़ी पूँजी और संपत्ति मानने लगे हैं ।
इसके अलावा, एक तरफ तो वे बच्चों को किताबी ज्ञान के लिए कॉलेज भेज रहे हैं, दूसरी तरफ शिक्षा का मज़ाक भी उड़ रहा है। जिन बच्चों ने जीवन में मुश्किलें देखी हैं, वे भी कई बार अपने रास्ते से भटक जाते हैं। ऐसी संतानों को सही राह पर कैसे लाया जाए ? इस प्रश्न का उत्तर नैतिकता सिखाना है। दरअसल विद्यालयों में किताबी ज्ञान से अंक प्राप्त करने की तुलना में बाहरी व्यावहारिक ज्ञान की अभिवृद्धि में कमी पाई जा रही है। विद्यालयों में छात्रों और शिक्षण पद्धति का मुख्य जोर परीक्षाओं में श्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर होता है। अच्छाई एवं बुराई का ज्ञान देने के लिए ‘वैल्यू एजुकेशन’ या ‘मोरल साइंस’ जैसे विषय सप्ताह में केवल एक दिन पढ़ाए जाते हैं। यदि इन विषयों की परीक्षा होती भी है तो अध्यापकों को परीक्षा-केंद्रित अध्ययन कराने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसलिए आधुनिकता से भरे इस जीवन में बच्चों को सही (नैतिक) और गलत (अनैतिक) की सीख नहीं मिल पा रही है। अतः नैतिक शिक्षा का ज्ञान सबसे पहले घर में दिया जाना चाहिए।
आजकल घर की शिक्षा से दूर छात्र विद्यालय में आकर अधिकांशतः केवल खेलने की आकांक्षा रखते हैं। उनके अनुसार घरों में खेलने का माहौल तथा समय नहीं मिल पाता है। बच्चों का मानना है कि विद्यालयों में खेलकूद के लिए निर्धारित शारीरिक प्रशिक्षण की अवधि पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से वे लघु-भोज और लंच ब्रेक को भी बिना खाए-पिए खेलने में ही बिता देते हैं। इस तरह के मामले अधिकांशतः लड़कों में पाए जाते हैं। उन्होंने खेलकूद को अपने शारीरिक विकास की प्राथमिकता के साथ-साथ आनंदित होने का माध्यम माना है। उनकी यह खुशी तब एक बड़ी चुनौती बन जाती है, जब वे विद्यालय में हर क्षण खेलने के लिए उतावले रहते हैं।
अक्सर देखा जाता है कि छात्र खेलकूद में अधिक रुचि लेते हैं, जबकि कुछ छात्राएँ शारीरिक थकान या पीड़ा के कारण खेलों से दूरी बना लेती हैं। लड़कियाँ अपना ध्यान पढ़ाई और अपने लक्ष्यों पर अधिक केंद्रित करती हैं जिसके परिणामस्वरूप परीक्षाओं में उनका प्रदर्शन अत्यंत सराहनीय होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि लड़कियाँ शिक्षा के महत्त्व के प्रति जागरूक हैं जबकि लड़के अपनी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा खेलकूद में लगाना पसंद करते हैं। लड़कियाँ नैतिकता के पाठ से अपने जीवन को सही रूप में सँवारने की समझ रखती हैं। वे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने और अच्छी संगति में रहने की मानसिक क्षमता स्वाभाविक रूप से पा लेती हैं। इसलिए अभिभावकों को घर में ही बेटों के खेलने की व्यवस्था करनी चाहिए। घर में खेलने का माहौल न मिलने पर, बच्चे विद्यालय में हर समय खेलने की जिज्ञासा रखते हैं। ऐसे बच्चों के व्यवहार से परेशान अध्यापकों का मानना है कि अधिकतर छात्र विद्यालय को केवल क्रीड़ा स्थल ही मानते हैं।
इस परिदृश्य से बाहर निकालने हेतु अभिभावकों को अपने बच्चों को समझाते हुए बताना चाहिए कि विद्यालय एक ज्ञानार्जन की शाला है । इसे अपना मनोरंजन का केंद्र न माने । घर में खेलकूद एवं मस्ती जैसी गतिविधियों के लिए भी समय तालिका के अनुसार निर्धारित समय का उपयोग करने का निर्देश अवश्य दें । समय व शिक्षा के महत्व पर अभिभावकों को खुले रूप से चर्चा करनी चाहिए । नित्य उन्हें व्यावहारिक गुण के पाठ स्वयं माता-पिता के द्वारा देने पर विद्यालय में वे समय बर्बाद नहीं करेंगे । कक्षा में अनावश्यक कार्यों में अपनी भागीदारी से दूर रहेंगे । अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पाएँगे । शिशु अवस्था में बालक घर से ही अपनी प्रथम शिक्षा प्राप्त करता है। इस दौरान अनुकंपा और स्नेह जैसे नैसर्गिक भाव उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। यदि उसे अपने परिवेश में दूसरों के प्रति सहानुभूति देखने को मिलती है तो उसकी आंतरिक चेतना में आदर्शपूर्ण स्वभाव स्थान ले लेता है। इस प्रकार के संस्कारों से प्रेरित होकर वह दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझने लगता है।
शांति और समाधान हमारे हाथ में ही हैं, और यदि यह बात बचपन से ही मन में बैठ जाए तो बच्चा कलह से दूर रहता है। संवेदनशील व्यक्तित्व वाला बच्चा विद्यालय एवं महाविद्यालय के दौरान बाहरी दुनिया के आकर्षण से प्रभावित नहीं होता। ये सभी सीख एक विद्यार्थी अपने घर में माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों से प्राप्त करता है। यही कारण है कि घर को प्रथम विद्यालय और माँ को पहला गुरु माना जाता है। इस आधार पर हर परिवार के बच्चे सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं। अतः घर की शिक्षा को प्राथमिकता देकर हम एक श्रेष्ठ पीढ़ी के निर्माण के कार्य में निरंतर योगदान दे सकते हैं।
Penned by Jayaajitan.
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