एक ही मनवा,
जहाँ तीन भाषाओं का संगम।
मातृभाषा मेरी,
दक्षिण की मिठास से भरी ।
राजकाज है मेरा,
सदा संचार सर्वमान आंग्ल भाषा द्वारा।
हिंदी ही है रोजी-रोटी मेरी,
इसी से होती है ज़िंदगी की हर आस पूरी।।
नाता हिंदी से विशिष्ट तीनों भाषाओं में,
काव्य कृतियों की सज्जा हिंदी से,
कल्पना कथाओं की बुनाई हिंदी से,
जितनी बुनी निज रचनाएँ।
जिह्वा,मनवा की नाव को ऐसे मैंने चलाया,
हिंदी भाषा की कल्पनाओं ने पार कराया ।।
हिंदी की डोर ने उड़ाया उस ओर,
बनती रही मेरी पहचान हर देवघर।
करती हूँ नतमस्तक हिंदी को,
सँवारा मेरे जीवन के लक्ष्य को।।
Penned by Jayaajitan.
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