खामोश गाँव दक्षिण भारत का एक खूबसूरत इलाका था जो अपने नाम के अनुरूप ही शांत माहौल से घिरा हुआ था । आमतौर पर हर गाँव शोरगुल से भरा होता है, खासकर तब जब बच्चे खेल-कूद कर रहे हों, जबकि खामोश गाँव के बच्चे बहुत ही अनुशासित रहकर खेलते थे क्योंकि हर घर में बच्चों को बचपन से ही शांति और सद्भाव के संस्कार दिए जाते थे । परिवार के हर सदस्य बहस या लड़ाई तक धीमी आवाज़ में करते थे ।चूंकि गाँव के ज्यादातर लोग पैदल ही शहर जाते थे, इसलिए वाहनों की आवाज भी लगभग शून्य थी। खामोश गाँव का हर कोना शोरगुल से मीलों दूर था। गाँव के लोग अपने क्षेत्र के नाम के विपरीत काम करने से कतराते थे। इन्हीं वजहों से खामोश गाँव की चर्चा दूसरे राज्यों में भी जोर-शोर से होती थी।
खामोशी गाँव में नारियल के ऊँचे – ऊँचे पेड़ सर्वदा हरे भरे रहते थे। वहाँ छोटे-छोटे टीले इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता में चार चाँद लगाते थे। टीलों के बीच हरी-भरी झाड़ियाँ ऐसी लगती थीं मानो खामोशी गाँव के आसमान में पेड़-पौधे उग आए हों। टीलों के बीच बह रही पानी की धारा दूध के झाग की छटा बिखेरती थी। यहाँ के लोग अपना पूरा समय खेती-बाड़ी में लगाकर अपना जीवन यापन करते थे। सूर्योदय से पहले गाँव के किसान बिना अन्न- जल ग्रहण किए ही हल लेकर अपने खेतों में पहुँच जाते थे। वे दिनभर खेत जोतते या कुदाल से ऊँची – ऊँची मेड़ बनाते थे। गाँव के लोग छोटे-छोटे पौधे लगाते और पौधों को पानी देकर उनकी भूख-प्यास मिटाते थे, जबकि भूख के कारण उनका पेट जलता रहता था। वे बहते पानी या कुएँ का पानी पीकर अपना पेट भरते थे। कुछ भाग्यशाली लोग अपने घर में बचे बासी चावल को हरी मिर्च के साथ खाते और फिर खेतों में चले जाते वे हमेशा यही सोचते थे कि उनका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है और उसे पढ़ाई में कड़ी मेहनत करनी है, इसलिए उसे अच्छा खाना-पीना चाहिए। ऐसी सोच रखने वाले माता-पिता में अपने परिवार के प्रति बेमिसाल प्यार और कर्तव्य भावना होती थी। खामोश गाँव के ग्रामीण बहुत ईमानदार थे, उनका सामाजिक जीवन भी देखने लायक था। वे सामाजिक मेलजोल में अपना समय निकालते थे। गाँव में शादी-ब्याह या बच्चों का नामकरण जैसी सभी रस्में वे मिलजुल कर पूरा करते थे।
उन्हीं दिनों खामोश गाँव में शराब की दुकान खुली। इसे खोलने वाला बाबू आबकारी ठेकेदार था। गाँव वालों में शराब की लत की लहर धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल रही थी। लोग अपना घर-बार भूलकर खेतों में जाने से ज्यादा शराब की दुकान पर जाने के लिए उत्साहित होने लगे। सबकी दिनचर्या बदलने लगी, वे अपनी कमाई शराब पर खर्च करने लगे, जिससे बाबू का धंधा खूब चलने लगा।पेड़ – पौधों को पानी देने के दायित्व से मुख चुराने वाले शराबी आदमियों की वजह से पेड़-पौधे सूखने लगे और प्रकृति भी इस विनाश को देखकर रोने लगी, हरियाली का नामोनिशान नहीं रहा। खामोश गाँव के हर घर में पति-पत्नी के झगड़े- मारपीट की दर्दनाक चीखें गूँजने लगीं। शांत गाँव की सूरत बदल गई और उपद्रव मचाने वालों का गाँव बन गया। शराब की आदत ने खामोश गाँव की रंगत बिगाड़ दी और शांति और समाधान को गहरे अंधेरे में डुबो दिया। शराब के कहर से बचने के लिए युवा गाँव छोड़कर दूसरे गाँवों में बसने लगे।
गाँव की साहसी लड़कियों ने शराब की दुकान बंद करवाने के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी। लड़कियों ने शराब की दुकान हटवाने का संकल्प लेकर आखिरकार अपनी ताकत से जीत हासिल कर ली। कानून की पहुँच ज्यादा दूर तक नहीं होती, नतीजतन बाबू को बिना लाइसेंस के शराब की दुकान चलाने के जुर्म में जेल की सजा सुनाई गई और दुकान को वहाँ से हटा दिया गया।
धीरे-धीरे लोग अपनी पुरानी दिनचर्या में लौटने लगे। मेहनतकश लोगों की मेहनत से खामोश गाँव की खूबसूरती फिर से छाने लगी। एक बार फिर वहाँ हरे – भरे पेड़ों की वजह से हरियाली लौट आई । खामोश गाँव की मीठी मुस्कान धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगी।
Penned by Jayaajitan.
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