बेजुबान-सा खड़ा है,
जुबान होने पर भी ।
हाथ बंधे हैं,
जतन करने पर भी।
लाचारी सह रहे हैं,
स्वेद कण बहाकर भी ।
मजबूरी पल रही है,
हर राह मुमकिन होने पर भी ।
सपने सिमट रहे हैं,
इंसान होने पर भी ।
बेजुबान पर षड्यंत्र रच रहे हैं,
“जीवन कितना अमूल्य” – बताने पर भी ।
भगीरथ – सादृश्य वो कर्मवीर हैं,
उपहास होता उनकी मनोव्यथा का भी ।
Penned by Jayaajitan.
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