कविता- कैसी व्यथा है ?

बेजुबान-सा खड़ा है,

जुबान होने पर भी ।

हाथ बंधे हैं,

जतन करने पर भी।

लाचारी सह रहे हैं,

स्वेद कण बहाकर भी ।

मजबूरी पल रही है,

हर राह मुमकिन होने पर भी ।

सपने सिमट रहे हैं,

इंसान होने पर भी ।

बेजुबान पर षड्यंत्र रच रहे हैं,

“जीवन कितना अमूल्य” – बताने पर भी ।

भगीरथ – सादृश्य वो कर्मवीर हैं,

उपहास होता उनकी मनोव्यथा का भी ।

Penned by Jayaajitan.

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