कविता: मोती

साज सज्जा से सज्जित तोरण,

अभ्यागत-स्वागत में मुक्तामाला।

और बन हार गले का,

प्रशंसा सबकी पाता,

मोती को था नाज स्वयं पर,

मंद- मंद मुस्काता,

पतित जमीन पर बिखरे मोती,

बटोरे सब रखा डिब्बे में,

सुला दिया मृत्यु शैया पर ll

Penned by Jayaajitan.

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