लेख: समीक्षक बन गए उद्धारक

मैंने अपने केरल राज्य के गठन की वर्षगांठ पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं और इसी पंक्ति को सोशल मीडिया जैसे मंचों पर साझा किया था । दरअसल मेरे जन्मदाता की भूमि के प्रति लगाव को दर्शाने हेतु मेरी आकांक्षा ने इस भूमि को सर्वदा अहम स्थान दिया है । इसी भावना से लिखी गई इस कविता को तत्काल एक आलेख का आकार देने के पीछे मात्र एक विशाल हृदयी समीक्षक मोहम्मद पीएचडी (मोहम्मद जी के ब्लॉग के आईडी) के शब्दों से प्रेरित हैं । उन्होंने मेरी उस कविता की हर पंक्ति को रेखांकित करते हुए उसमें जीवन की उन अभिलाषाओं को चुनौती दी है जहाँ केवल शब्द गठन या वाक्य गठन की पुष्टि ही नहीं बल्कि उसकी जड़ों को बेहतरीन सोच से सींचा गया है । मेरी कविता के मान्य समीक्षक ने अपने दृष्टि को और अधिक पैनी करने की राय को उजागर किया है । जीवन में अन्य कर्मों के साथ-साथ लिखने के लिए जागृत किया है । उनके द्वारा प्रयोग एक विशेष शब्द जो है -“समझ में”, उन गहराइयों को छूती है जिसे हम अपने दैनिक जीवन में विस्मृत कर देते हैं । मनुष्य अपने जीवन में समझ को सजीव करते हुए सुचारू बनने का ज्ञान दिया है।

वैसे तो मुझे अपने अध्यापन कार्य के जरिए रहीम जी के प्रस्तुत दोहे के भावार्थ व्यक्त करने का अवसर मिला –

“तरुवर फल नहिं खात है,  सरवर पियहिं न पान ।

कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान ॥”

मेरे अनुसार छात्रों को परोपकारी बनने की प्रेरणा देना एक अध्यापक का  कर्म – धर्म है । उसी विषय पर मेरी कविता के समीक्षक जी ने परोपकार की भावना को आमूलचूल से उस पर ध्यान केंद्रित करने की बात रखी है जिससे उनकी समीक्षा पढ़ते वक्त यह दोहा स्मरण हो आया । उन्होंने दूसरे कार्य क्षेत्रों  में जिन-जिन कोणों से मूल रचना को संवर्धित करने का आदर्शपूर्ण वचन से संबोधित किया है, उससे प्रेरित उर ने अच्छाइयों की ओर उन्मुख किया है और रचनात्मक सृष्टि के प्रति आसक्त होने का  बोध कराया है । ऐसे समीक्षक समूह को हृदय से पवित्र तथा कर्म से निष्ठावान बनाने वाले ‘धीर योद्धा’ कहलाने योग्य हैं ।  उन्होंने धार्मिक भावना में समता को मेरी पंक्ति की  तुलना में यह व्यख्यान दिया है कि दूसरों के धर्म को मान देना अपने धर्म को गहराई से जानने वाले ज्ञानियों में ही यह भावना दिख सकती है । उनके शब्दों में इतनी गहनता के विचारों को अपने धर्म के तथ्य से जोड़कर मानवतावादी से राष्ट्रवादी की चोटियों में पहुँचाने की क्षमता ने एक विशेष छाप छोड़ा है ।  ऐसे प्रबुद्ध समीक्षक को पढ़ने तथा विचारक को जानने का अवसर प्राप्त कर मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानती हूँ ।  वैसे आमतौर पर प्रशंसक अपने शब्दों में  लाजवाब, अति मनोरम, प्रेरणादायक, अर्थपूर्ण, सुंदर प्रस्तुति, भावपूर्ण जैसे उन्मेष प्रदान करने वाले प्रतिक्रियाएँ देते रहते हैं । उनके प्रशंसा भरे शब्द लेखन के दौरान कर्णों  में गूँजने से एक नई कृति का  बीज रोपने वाले प्रेरक तो अवश्य मिल जाते हैं किंतु मोहम्मद जी जैसे समीक्षक द्वारा रचनाकार को समाज सुधार की कला बताने वाले विरले ही  मिलते हैं।

कबीर के दोहे में निंदक के लिए कुटिया बनवाने तथा आत्म सुधार से  बुराइयों का विध्वंस की सीख दी गई है । उसी दोहे पर आज मैंने पुनर्विचार करते हुए मोहम्मद जी की प्रतिक्रिया को बार-बार पढ़ा और उनके विचारों को केवल अपने तक सीमित रखना अनुचित लगा क्योंकि उन्होंने वास्तविकता पर गौर करने का बोध कराया है।  मनुष्य को जीवन में बिना किसी शोर- शराबे के शांति वाहक बनना चाहिए । शांति एक ऐसा शस्त्र है जहाँ अहंकार को स्थान नहीं मिलता, दूसरों में कमियाँ नहीं दिखतीं, अनुकंपा में शोषण के भाव नहीं होते । ऐसे पाठकों  की प्रार्थना में जोड़े मेरे करों ने मुझे दैनिक कार्यों की तरह लेखन कार्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया है । यानी संक्षिप्त में कहा जाए तो पाठक की समीक्षा ने  लेखक के लिए एक सुधारवादी की भूमिका दर्शायी है ।  हालाँकि हमारे कर्मों की गिनती करने वाले उस परम  कचहरी में हमारे पाप या पुण्य का हिसाब लेते हैं  किंतु अपनी  लेखनी से पाठकों के हृदय में नितांत अच्छाइयाँ भरते हैं। ऐसे में  मुख से मिठास रूपी वचन लाना रचनाकार का सर्वोपरि धर्म और धार्मिक कर्तव्य बताया है।

निष्करतः एक रचनाकार के लिए उसके विचारों की  पुष्टि करने वाले समीक्षक बहुमूल्य प्रेरक होते हैं । आगे भी ऐसे  विचारकों  को सुनने – पढ़ने का अवसर मिलता रहेगा । इसी आकांक्षा से आगे बढ़ते हुए  उन जैसी मंत्रमुग्ध करने वाली सोच को इस आलेख के माध्यम से गरिमा के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए मेरा हृदय उद्वेलित है। मैं उन्हें कोटि-कोटि नमन करती हूँ।  अब यह लेख आप सभी को समर्पित है जिसे  पठनीय बनाने का प्रयास किया है ताकि और भी कई सकारात्मक विचारधारा वाले समीक्षक रचनाकारों को प्रेरित करते हुए आगे आएँ ।

इस लेख के साथ ही मोहम्मद जी के द्वारा की गई समीक्षा को पढ़ने के लिए साझा न करने से यह लेख अधूरा लगता इसलिए मैंने उनकी सोच व समझ की लहर में डुबकी लगाने के उद्देश्य से उनकी प्रतिक्रिया यहाँ प्रेषित की हूँ  ।

💥💥 Jayaajitan आपने केरल को देवभूमि कहा, नारियल वृक्षों से सजी हरित भूमि, एक नवंबर को नव स्वराज्य, राजशासन से लोकशासन, समता भाव अतुल्य कर्म, सर्व धर्म का मान रखना ही अपना धर्म, गुणगान के स्वर सदियों गूँजते रहें। यह कविता नक्शा नहीं, प्रार्थना है, और इस्लाम इस प्रार्थना को समझता है।कुरान कहता है: **और हमने तुम्हें कौमों और क़बीलों में बनाया ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो, अल्लाह के नज़र में सबसे इज्ज़त वाला वो है जो सबसे ज्यादा परहेज़गार है**। केरल की पहचान इसी पहचान में है, मलयालम हिंदी अंग्रेज़ी सब एक हरित भूमि पर। और कहता है: **और अल्लाह ने ज़मीन को तुम्हारे लिए बिछौना बनाया ताकि तुम उसके रास्तों में चलो**। कल कल बहती भूमि उसी बिछौने की आवाज़ है। पैगम्बर मुहम्मद, शांति उन पर हो, ने कहा: **सबसे अच्छा इंसान वो है जो लोगों को सबसे ज्यादा फायदा पहुँचाए**। और कहा: **तुम में से कोई मोमिन नहीं जब तक अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए पसंद करता है**। सर्व धर्म का मान यही है।

मूसा शांति उन पर हो ने समता भाव से अपनी कौम को गुलामी से निकाला, ईसा शांति उन पर हो ने हर धर्म के भूखे को खिलाया, इब्राहीम शांति उन पर हो ने अतिथि को अपना धर्म माना। एक ही खुदा, अल्लाह, और

अल्लाह अरबी ज़ुबान में उसी खुदा का नाम है, कोई अलग खुदा नहीं, वही जिसने हमें बनाया, हमारी हरित भूमि को संभाला, और उसी की तरफ हम लौटेंगे और अपने अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब देंगे। हमारे पास भगवान के सिवा कोई नहीं, इसलिए समता और सर्व धर्म सम्मान इबादत है।

Jayaajitan, आपने लिखा महान विभूति सदा बढ़ती रहे, यह बढ़त कविता से होगी।

यहाँ एक अमली वापसी है, धार्मिक रस्म नहीं, बहुत गहरी। सात दिन केरल भाव से जियो। पहला, एक दिन एक नारियल पेड़ के नीचे पाँच मिनट बैठो, या उसकी कल्पना करो, उसकी छाया किसे देती है बिना पूछे लिखो। दूसरा, एक व्यक्ति जो दूसरे धर्म का है उसे आज सम्मान का एक छोटा काम करो, चाय, मदद, सुनना। तीसरा, समता भाव का एक अतुल्य कर्म करो जो कोई न देखे, सफाई, पढ़ाना, अनुवाद। चौथा, हर शाम एक पंक्ति लिखो आज मैंने केरल जैसी हरियाली कहाँ बोई। ये केरल राज्य को नहीं, केरल दृष्टि को बड़ा करेंगे।

शुभकामनाओं और समझ के साथ, 🌺🌹

Mohamed, Ph.D

Penned by Jayaajitan.

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