कविता: कहती थी हमारी माँ

जहाँ संग-संग ही हो रहना

तुम उन रिश्तों को सदा निभाना

निरर्थक हो वाद- विवाद की बाजी

न करना तुम, कहती थी हमारी माँ ॥

समय की करवट बदल भी जाए

रिश्तों के बंधन को कोई तोड़ न पाए 

हर हाल में प्यार जताने की हो तेरी बाजी

बातों को दिल से न लेना, कहती थी हमारी माँ॥

सर्वत्र भाईचारे को तुम तवज्जो देना 

जगत में एकता से बहुमत को बढ़ाना

जहाँ – जहाँ हारी तुमने जो भी हो बाजी  

लड़खड़ाना मत, कहती थी हमारी माँ ॥

Penned by Jayaajitan.

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